पुरी | ७.७ | रयत समाचार
(Shankaracharya Statement) श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य, श्रीगोवर्धन मठ-पुरी पीठ यांनी सनातन धर्म, संत परंपरा, धर्मसंस्था आणि देशातील सद्यस्थितीवर परखड भूमिका मांडत सनातन मूल्यांच्या संरक्षणासाठी व्यापक जनजागृतीची आवश्यकता असल्याचे प्रतिपादन केले.
(Shankaracharya Statement) त्यांनी संत परंपरेतील बदल, धार्मिक संस्थांची भूमिका आणि धर्मसंसद या संकल्पनेवर भाष्य केले. पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थेमध्ये झालेल्या बदलांमुळे समाजात संभ्रम निर्माण झाल्याची खंत त्यांनी व्यक्त केली.
(Shankaracharya Statement) गोसंरक्षणाच्या विषयावर बोलताना शंकराचार्य म्हणाले, गोवंशाच्या रक्षणासाठी त्यांनी आयुष्यभर संघर्ष केला असून, एक काळ असा होता की भारतातील गोहत्येमुळे नेपाळमध्ये जाण्याचाही विचार त्यांनी केला होता. मात्र, भारतातील गोसंरक्षणासाठी संघर्ष सुरू ठेवण्याचा निर्णय त्यांनी घेतल्याचे सांगितले.
सध्याच्या परिस्थितीत केवळ शांत बसून चालणार नाही, तर सनातन परंपरा आणि श्रद्धास्थानांच्या संरक्षणासाठी विविध स्तरांवर नियोजनबद्ध प्रयत्न सुरू असल्याचे त्यांनी स्पष्ट केले. भारतात दीर्घकाळ टिकणारे शासन तेच ठरेल, जे सनातन मानबिंदूंचे संरक्षण करण्याची क्षमता आणि इच्छाशक्ती बाळगेल, असेही त्यांनी मत व्यक्त केले.
शंकराचार्यांनी समाजातील सर्व घटकांनी सनातन परंपरेचे जतन आणि गोसंरक्षणासाठी एकत्रितपणे कार्य करण्याचे आवाहन केले.
मुळ निवेदन वाचा : संत वेश में पार्टी के कार्यकर्ता भर दिए गए। संत भी कहां रह गए? येने-चुने संत रह गए हैं, बाकी आप देखेंगे तो यह कूटनीति किसकी थी? अंग्रेजों की थी। उन्होंने क्या किया, नेहरू जी को आगे करके ‘भारत साधु समाज’ का गठन कर दिया, संतों को कांग्रेसी बना दिया गया।
उसका ही नकल किया अशोक सिंघल जी ने। क्या किया? धर्म संसद जो काम शंकराचार्य का था वह अशोक सिंघल करने लग गए। धर्म संसद बना करके चारों कुंभों पर अधिकार कर लिया विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने। जो उस मंच पर बैठ जाए वो शंकराचार्य हो जाए। शंकराचार्य भी नकली ही बनाने लग गए। अब जब शंकराचार्य भी नकली, तो समझ लीजिए घी भी नकली, मसाला भी नकली, शंकराचार्य भी नकली फिर होगा क्या?
तो परिस्थिति यह हो गई कि विश्व हिंदू परिषद के मंच पर जो बैठ जाए वो शंकराचार्य। मुझे मालूम है 50 साल पहले कर्ण सिंह, डॉक्टर कर्ण सिंह को शंकराचार्य कहके प्रख्यापित किया गया, पैंट पजामा वाले कर्ण सिंह, मेरे परिचित है कर्ण सिंह। सिरोही राजस्थान में मिले थे। एक गृहस्थ उनको भी शंकराचार्य के रूप में विश्व हिंदू परिषद ने ख्यापित किया। किससे आशा रखेंगे कि आंसू पूछेगा?
ऐसी स्थिति में बहुत वेदना है हमको, हम तो 57 साल हो गए इस वेश में 60 से, इस वेश में आए हैं। 60 सन 60 से इस इधर हैं। भारत हम छोड़ रहे थे कि नेपाल जाएंगे। 50 साल पहले जिस देश में गौवंश की हत्या होती उस देश में नहीं रहेंगे। लेकिन मन में हुआ कि परंपरा से भारती हो, नेपाल में चले जाओगे तो भारत के गौवंश की हत्या का विरोध कौन करेगा? इसलिए नेपाल जाने से रुका।
अब तो नेपाल में भी जैसा शासन तंत्र बना उससे आशा नहीं की जा सकती कि गौवंश की रक्षा वहां भी होगी। गो हत्यारों का तांडव नित्य है। इस परिस्थिति में बहुत गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है और हम चुपचाप हैं, ऐसा भी नहीं है। अंदर-बाहर हर दृष्टि से व्यूह रचना कर रहे हैं और राजनेता हमको शिकंजा कसने, हम पर शिकंजा कसने का प्रयास करते हैं, शिकंजे के गर्भ में चपेट में वो स्वयं आ रहे हैं।
इसलिए अधिक समय तक भारत में इस प्रकार का शासन तंत्र नहीं चल सकता है। भारत में वही शासन कर सकेगा, कोई दल या व्यक्ति, जिसे सनातन मान बिंदुओं की रक्षा का बल और वेग प्राप्त होगा। अन्य कोई भी दल भारत में अधिक समय अब शासन नहीं कर सकेगा। यही हमारा अभियान है।
-श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्यजी, श्रीगोवर्धनमठ-पुरीपीठ
#हिन्दूराष्ट्र #गो_हत्या_बंद
Discover more from Rayat Samachar
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



